Monday, 19 September 2016

अनमोल अपने...

सुबह होते ही terrace पर घूमने की आदत न जाने कितने सालों पुरानी हैं। रोज वहीं साधारण सी सुबह, सिर्फ चिड़ियो का शोर कानों में रस घोलता हुआ, आत्मा को तृप्त करती सुबह की ठंडक, टाइम को व्यवस्थित  कर सब कुछ सुघड़ता से निबटाना हर रोज की सुबह की चुनौती हैं, कि भई बिना किसी घड़ी के मैं तो अपने समय पर हूँ तुम कहां हो? स्कूल बस में बच्चों का बैठना एक स्त्री को कितना चैन देता हैं पुरुषों के लिए इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। फिर अगला एक घंटा अपने मोबाइल को समर्पित सबसे सुकून भरा। मोबाइल खोलते ही उत्सव का सा माहौल दिखाई देता हैं। ऐसा लगता हैं मानो इस पर अपनी तस्वीरे post करने वाले लोगों के पास न तो चुनौतियाँ हैं, न परेशानियाँ और न ही समय का आभाव। खुशी से सबके चेहरे खिलखिलाते  हुए ही दिखाई देते हैं। देखा है कभी किसी को अपनी रोती हुई तस्वीरें सबके साथ सांझा करते हुए?
पर यह सब देखकर खुद का चैन तो मानो कहीं दुबक कर छुप जाता हैं और ऐसा लगता हैं कि छुट्टियों का, मजें लेने का, समय का आभाव सिर्फ मेरे ही हिस्से आया हैं। इतने में दस साल की बिटिया दौड़ती हुई आकर गले में झूल कर अपनी अनगिनत बातों का पिटारा खोल, शब्दों की जादुई छड़ी सी घुमा सपनों की दुनिया में ले जाती हैं। उसकी आंखों की चमक, उसकी आवाज की मासूम  खनक, उसका भोलापन और जानो कभी खत्म न होने वाली ढेर बातें फेसबुक को भी कहीं उड़ा ले जाती हैं। उसके सोने के बाद भी मन उसी की बातों में उलझा चेहरे पर अनजाने ही मुस्कुराहट बिखेरे रखता हैं। और इस निश्छल प्रेम के आगे सब व्यर्थ लगने लगता हैं
 महसूस करके देखे ऐसा चैन जो किसी के खुशी के लम्हों को देख कर होता हैं, बच्चों को सीने से लगा उनकी धड़कने महसूस करने से होता हैं, किसी जरूरतमंद के लिए थोड़ी मदद करने से आत्म तृप्ति के भाव को महसूस करने से होता हैं। ये चैन और खुशी अनमोल हैं। अपनों के लिए स्वयं को गृहस्थी के हवन कुंड में होम कर, प्राणवायु बन सुगंध सा बस जाना एक स्त्री के रूप मेरे लिए अनमोल है। सिर्फ तस्वीरो, मोबाइल में दिखने और लिख कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले लोगों के मुकाबले अपने पास रहने वाले, प्यार करने वाले लोगों को सहेज के रखना अनमोल हैं।


Sunday, 18 September 2016

स्वपन...

एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं

अपनी स्वर्णमयी आभा से कल्पनाएँ साकार चाहता हैं,

उजाला ऐसा कि फिर अंधकार का स्थान न हो,

लक्ष्य की बाधाओं की चुनौती स्वीकार चाहता हैं,

संभावनाओं की सीमा लांघ असंभव को आत्मसात करना चाहता हैं,

एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।


ओझल न हो एक पल को भी,

 संशय का समाधान चाहता हैं,

आँखो में प्रतिपल प्रचंड अग्नि सा तेज चाहता हैं,

स्वप्न साकार हो ऐसा सिर्फ ऐसा विश्वास चाहता हैं,

एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।