'स्त्री'- सुनने में बेहद भारी सा लगने वाला शब्द पर असल में व्यक्त करता है बेहद संवेदनशील मन की स्वामिनी को। कभी तो अपने मन में ही मुस्कराती, तो कभी खिलखिला कर हँसती, कभी आंसुओ से रूठती और खुद को ही मनाती हुई, पर फिर भी जीवन के सभी अनुभवो का अपने संयम, मौन तो कभी मुस्कुराहट से सामना करती हैं, परिस्थितियो के साथ एक सीधा संवाद स्थापित करती है।
सब कहते है कि महिलाएं स्वावलंबी हो गई हैं, अपार आत्मविश्वास से भरी हुई है, पर सच्चाई यह है कि वह हर वक्त खुद की ही क्षमता को चुनौती देती, कई हिस्सो मे बटी अपनी शख्सियत को टटोलती, अंदर ही अंदर खुद को बटोरती और अपने अंदर छिपे अदम्य साहस और समस्त ऊर्जा को संभाल, सशक्त रुप में दिखने का प्रयास भर करती हैं।
स्त्री के अपने घर से बाहर पैर रखते ही न जाने कितनी ही निगाहें उठती हैं आंकलन करती हुई उसके पूरे अस्तित्व का, फिर चाहे वह कामकाजी महिला हो अथवा घरेलू । पर जाने अनजाने, अनदेखा सा करते हुए भी बड़ा विलक्षण सा गुण प्रभू ने दिया है उन निगाहो को समझने का।
आंकलन करती निगाहो को कभी तो वह देख कर भी अनदेखा करती है तो कभी कड़क निगाहो से झिड़कती है। तीर सी महसूस करती लोगो की निगाहें चुभती जरुर है उसे। पर मन के आक्रोश को शब्दो में न बांध कर अपनी अनुशासित और नपी तुली आंखो से विद्रोह करती है, तो कभी जानबूझकर बेखबर सी बन अपने ही विचारो को व्यवस्थित करती, अपने ही ख्यालो मे मग्न, मन की हड़बड़ाहट को संयमित करती है।
कारण? क्योकि एक स्त्री न सिर्फ अपनी सोच बल्कि अपनी परवरिश, अपने जीवनसाथी और अपने पूरे परिवार को परिभाषित करती है। उसका आचरण, हर परिस्तिथि मे उसकी समझ, उसका समर्पण ही उसके पूरे व्यक्तित्व का सूचक है। मानो औरत ही सर्वस्व है, सभी का प्रतीक है। मानो सब ऊर्जा उसके इर्द गिर्द ही है। फिर उसका आंकलन क्यो?
वह जो अपने बच्चो को उनकी कल्पनाओ के धुंधले चेहरो को साफ रुप में आइने में दिखाती हैे,वह जो उनको सपनो को हकीकत मे बदलने के लिए प्रोत्साहित करती और उस राह पर चलते हुए हौसले भरी थपकी देती है, वह जो मकान को घर की परिभाषा देती है और अल्पना सी रंगो मे ढल जाती है, वह जो आम से दिन को उत्सव के उल्लास सी तरंग बना जाती है , वह जो अपने से पहले अपनो का मान रखती है और प्रकाश पुंज सी ऊष्मा बिखेरती सभी को रौशन करती है, वह जो अपनों के लिए स्वयं को गृहस्थी के हवन कुंड में समिधा स्वरूप होम कर, प्राणवायु बन सुगंध सा बस जाती है उस स्त्री का यह समर्पण अनमोल है। पर उसके व्यक्तित्व का आंकलन उसे मान्य नही।
डा. कीर्ति गोयल
'स्त्री'- सुनने में बेहद भारी सा लगने वाला शब्द पर असल में व्यक्त करता है बेहद संवेदनशील मन की स्वामिनी को। कभी तो अपने मन में ही मुस्कराती, तो कभी खिलखिला कर हँसती, कभी आंसुओ से रूठती और खुद को ही मनाती हुई, पर फिर भी जीवन के सभी अनुभवो का अपने संयम, मौन तो कभी मुस्कुराहट से सामना करती हैं, परिस्थितियो के साथ एक सीधा संवाद स्थापित करती है।
सब कहते है कि महिलाएं स्वावलंबी हो गई हैं, अपार आत्मविश्वास से भरी हुई है, पर सच्चाई यह है कि वह हर वक्त खुद की ही क्षमता को चुनौती देती, कई हिस्सो मे बटी अपनी शख्सियत को टटोलती, अंदर ही अंदर खुद को बटोरती और अपने अंदर छिपे अदम्य साहस और समस्त ऊर्जा को संभाल, सशक्त रुप में दिखने का प्रयास भर करती हैं।
स्त्री के अपने घर से बाहर पैर रखते ही न जाने कितनी ही निगाहें उठती हैं आंकलन करती हुई उसके पूरे अस्तित्व का, फिर चाहे वह कामकाजी महिला हो अथवा घरेलू । पर जाने अनजाने, अनदेखा सा करते हुए भी बड़ा विलक्षण सा गुण प्रभू ने दिया है उन निगाहो को समझने का।
आंकलन करती निगाहो को कभी तो वह देख कर भी अनदेखा करती है तो कभी कड़क निगाहो से झिड़कती है। तीर सी महसूस करती लोगो की निगाहें चुभती जरुर है उसे। पर मन के आक्रोश को शब्दो में न बांध कर अपनी अनुशासित और नपी तुली आंखो से विद्रोह करती है, तो कभी जानबूझकर बेखबर सी बन अपने ही विचारो को व्यवस्थित करती, अपने ही ख्यालो मे मग्न, मन की हड़बड़ाहट को संयमित करती है।
कारण? क्योकि एक स्त्री न सिर्फ अपनी सोच बल्कि अपनी परवरिश, अपने जीवनसाथी और अपने पूरे परिवार को परिभाषित करती है। उसका आचरण, हर परिस्तिथि मे उसकी समझ, उसका समर्पण ही उसके पूरे व्यक्तित्व का सूचक है। मानो औरत ही सर्वस्व है, सभी का प्रतीक है। मानो सब ऊर्जा उसके इर्द गिर्द ही है। फिर उसका आंकलन क्यो?
वह जो अपने बच्चो को उनकी कल्पनाओ के धुंधले चेहरो को साफ रुप में आइने में दिखाती हैे,वह जो उनको सपनो को हकीकत मे बदलने के लिए प्रोत्साहित करती और उस राह पर चलते हुए हौसले भरी थपकी देती है, वह जो मकान को घर की परिभाषा देती है और अल्पना सी रंगो मे ढल जाती है, वह जो आम से दिन को उत्सव के उल्लास सी तरंग बना जाती है , वह जो अपने से पहले अपनो का मान रखती है और प्रकाश पुंज सी ऊष्मा बिखेरती सभी को रौशन करती है, वह जो अपनों के लिए स्वयं को गृहस्थी के हवन कुंड में समिधा स्वरूप होम कर, प्राणवायु बन सुगंध सा बस जाती है उस स्त्री का यह समर्पण अनमोल है। पर उसके व्यक्तित्व का आंकलन उसे मान्य नही।
डा. कीर्ति गोयल







