Tuesday, 4 July 2017

‌'स्त्री'



‌'स्त्री'- सुनने में बेहद भारी सा लगने वाला शब्द पर असल में व्यक्त करता है बेहद संवेदनशील मन की स्वामिनी को। कभी तो अपने मन में ही मुस्कराती, तो कभी खिलखिला कर हँसती, कभी आंसुओ से रूठती और खुद को ही मनाती हुई, पर फिर भी जीवन के सभी अनुभवो का अपने संयम, मौन तो कभी मुस्कुराहट से सामना करती हैं, परिस्थितियो के साथ एक सीधा संवाद स्थापित करती है।
‌सब कहते है कि महिलाएं स्वावलंबी हो गई हैं, अपार आत्मविश्वास से भरी हुई है, पर सच्चाई यह है कि वह हर वक्त खुद की ही क्षमता को चुनौती देती, कई हिस्सो मे बटी अपनी शख्सियत को टटोलती, अंदर ही अंदर खुद को बटोरती और अपने अंदर छिपे अदम्य साहस और समस्त ऊर्जा को संभाल, सशक्त रुप में दिखने का प्रयास भर करती हैं।
 स्त्री के अपने घर से बाहर पैर रखते ही न जाने कितनी ही निगाहें उठती हैं आंकलन करती हुई उसके पूरे अस्तित्व का, फिर चाहे वह कामकाजी महिला हो अथवा घरेलू । पर जाने अनजाने, अनदेखा सा करते हुए भी बड़ा विलक्षण सा गुण प्रभू ने दिया है उन  निगाहो को समझने का।
आंकलन करती निगाहो को कभी तो वह देख कर भी अनदेखा करती है तो कभी कड़क निगाहो से झिड़कती है। तीर सी महसूस करती लोगो की निगाहें चुभती जरुर है उसे। पर मन के आक्रोश को शब्दो में न बांध कर अपनी अनुशासित और नपी तुली आंखो से विद्रोह करती है, तो कभी जानबूझकर बेखबर सी बन अपने ही विचारो को व्यवस्थित करती, अपने ही ख्यालो मे मग्न, मन की हड़बड़ाहट को संयमित करती है।
कारण? क्योकि एक स्त्री न सिर्फ अपनी सोच बल्कि अपनी परवरिश, अपने जीवनसाथी और अपने पूरे परिवार को परिभाषित करती है। उसका आचरण, हर परिस्तिथि मे उसकी समझ, उसका समर्पण ही उसके पूरे व्यक्तित्व का सूचक है। मानो औरत ही सर्वस्व है, सभी का प्रतीक है। मानो सब ऊर्जा उसके इर्द गिर्द ही है। फिर उसका आंकलन क्यो?
वह जो अपने बच्चो को उनकी कल्पनाओ के धुंधले चेहरो को साफ रुप में आइने में दिखाती हैे,वह जो उनको  सपनो को हकीकत मे बदलने के लिए प्रोत्साहित करती और  उस राह पर चलते हुए हौसले भरी थपकी देती है, वह जो मकान को घर की परिभाषा देती है और अल्पना सी रंगो मे ढल जाती है, वह जो आम से दिन को उत्सव के उल्लास सी तरंग बना जाती है , वह जो अपने से पहले अपनो का मान रखती है और प्रकाश पुंज सी ऊष्मा बिखेरती सभी को रौशन करती है, वह जो अपनों के लिए स्वयं को गृहस्थी के हवन कुंड में समिधा स्वरूप होम कर, प्राणवायु बन सुगंध सा बस जाती है उस स्त्री का यह समर्पण अनमोल है। पर उसके व्यक्तित्व का आंकलन उसे मान्य नही।

डा. कीर्ति गोयल

Tuesday, 4 October 2016

Pink


छोटे होते लोगों की प्रश्नसूचक निगाह बहुत अचंभित करती थी कि 'अरे दो बेटियाँ ही हैं?' और पापा जानो कोई फर्क ही नहीं पड़ता मुस्कराते हुए बड़े गर्व से कहते-' जी हाँ! मेरी दो बिटिया हैं।  और मम्मी! वो तो कहीं हममें ही डूबी, हमें सॅवारती, कुशल कुम्हार सी सांचे में हमें ढालती, घर और कार्य स्थली में गजब का सामंजस्य बिठाती, कहीं हममें शायद खुद को ढूंढती पूरी दुनिया से बेखबर। क्योंकि माँ शब्द को कोई फर्क नहीं पड़ता कि बेटा हैं या बेटी ये फर्क तो दुनिया उसे समझाती हैं । माँ अपने आप में इतना विशाल शब्द हैं कि कहने की बात नहीं कि माँ शब्द हैं तो बच्चा भी शामिल हैं। लेकिन हमारे आसपास के लोग हैरान कि क्या इन्हें बेटे की जरूरत नहीं पर कौन परवाह करें ऐसी बातों की? मम्मी पापा तो सिर्फ और सिर्फ हम दोनों बहनों को दुनिया की भीड़ में मज़बूत योद्धा सा, हर कला में बड़ी चतुराई से बिना हमारे जाने हमें निपुण बनाने में जुटे थे। शिक्षा के साथ चरित्र को सर्वोपरी रखा।
कोई रोक टोक नहीं पर एक अनकहा सा अनुशासन। किसी चीज़ की मनाही नहीं पर फिजूलखर्ची का स्थान नहीं। सबसे बोलने की खुली छूट पर शब्दों के सही चयन पर बेहद पैनी निगाह। सही को सही कहने का साहस और गलत के विरुद्ध खड़े होने की अनूठी हिम्मत दी। 'डर' शब्द जो लोगों ने समझाया हमारे शब्द कोष में कभी रहा ही नहीं।

हाल ही में एक फिल्म देखी 'Pink'. यह फिल्म एक नई सोच की कहानी हैं। नयापन स्त्री का अपने अस्तित्व को सार्थक स्थापित करने का, अपनी इच्छा, अनइच्छा के लिए संघर्ष करने का, सबल रूप के साथ अपने पक्ष को रखने का। लड़को की मानसिकता पर कटाक्ष कर समाज के कुरूप सत्य को उजागर किया इस फिल्म ने। पर यथार्थ के धरातल पर  बेटों को मर्यादा का पाठ पढ़ाने की जरूरत बराबर से हैं। अपने अहं में कहीं वो पथ से न भटके इस तरह के अनुशासन में सूतना जरूरी हैं। इस फिल्म में कहीं न कहीं स्वाभिमान, स्वतंत्रता, आत्मविश्वास जैसे शब्दों की आड़ ले, current generation शब्द का पर्दा डलता दिखाई दिया। पर क्या इन शब्दों की चादर ओढ़ हम अपने संस्कारों की धरोहर समेट पाएँगे? खुलेपन की अंधी दौड़ में अपने बच्चों को मर्यादा का अर्थ समझा पाएँगे? बराबरी की रस्साकशी में कहीं घड़ी की सुई character decide न करें सिर्फ इसलिए  हमारी बिटिया अनुशासित रहना झुटलाए क्या ये जरूरी हैं? अच्छी अदाकारी एक चीज है और ऐसी फिल्म के माध्यम से संदेश देना अलग। बहुत से प्रश्नचिह्न खड़े दिखते हैं शायद समाधान हर पहलू को टटोलने से दिखाई दे क्योंकि फिल्मकार की तरफ से तो - 'The ball is in your court audience' प्रतीत होता है 😊






Monday, 19 September 2016

अनमोल अपने...

सुबह होते ही terrace पर घूमने की आदत न जाने कितने सालों पुरानी हैं। रोज वहीं साधारण सी सुबह, सिर्फ चिड़ियो का शोर कानों में रस घोलता हुआ, आत्मा को तृप्त करती सुबह की ठंडक, टाइम को व्यवस्थित  कर सब कुछ सुघड़ता से निबटाना हर रोज की सुबह की चुनौती हैं, कि भई बिना किसी घड़ी के मैं तो अपने समय पर हूँ तुम कहां हो? स्कूल बस में बच्चों का बैठना एक स्त्री को कितना चैन देता हैं पुरुषों के लिए इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। फिर अगला एक घंटा अपने मोबाइल को समर्पित सबसे सुकून भरा। मोबाइल खोलते ही उत्सव का सा माहौल दिखाई देता हैं। ऐसा लगता हैं मानो इस पर अपनी तस्वीरे post करने वाले लोगों के पास न तो चुनौतियाँ हैं, न परेशानियाँ और न ही समय का आभाव। खुशी से सबके चेहरे खिलखिलाते  हुए ही दिखाई देते हैं। देखा है कभी किसी को अपनी रोती हुई तस्वीरें सबके साथ सांझा करते हुए?
पर यह सब देखकर खुद का चैन तो मानो कहीं दुबक कर छुप जाता हैं और ऐसा लगता हैं कि छुट्टियों का, मजें लेने का, समय का आभाव सिर्फ मेरे ही हिस्से आया हैं। इतने में दस साल की बिटिया दौड़ती हुई आकर गले में झूल कर अपनी अनगिनत बातों का पिटारा खोल, शब्दों की जादुई छड़ी सी घुमा सपनों की दुनिया में ले जाती हैं। उसकी आंखों की चमक, उसकी आवाज की मासूम  खनक, उसका भोलापन और जानो कभी खत्म न होने वाली ढेर बातें फेसबुक को भी कहीं उड़ा ले जाती हैं। उसके सोने के बाद भी मन उसी की बातों में उलझा चेहरे पर अनजाने ही मुस्कुराहट बिखेरे रखता हैं। और इस निश्छल प्रेम के आगे सब व्यर्थ लगने लगता हैं
 महसूस करके देखे ऐसा चैन जो किसी के खुशी के लम्हों को देख कर होता हैं, बच्चों को सीने से लगा उनकी धड़कने महसूस करने से होता हैं, किसी जरूरतमंद के लिए थोड़ी मदद करने से आत्म तृप्ति के भाव को महसूस करने से होता हैं। ये चैन और खुशी अनमोल हैं। अपनों के लिए स्वयं को गृहस्थी के हवन कुंड में होम कर, प्राणवायु बन सुगंध सा बस जाना एक स्त्री के रूप मेरे लिए अनमोल है। सिर्फ तस्वीरो, मोबाइल में दिखने और लिख कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले लोगों के मुकाबले अपने पास रहने वाले, प्यार करने वाले लोगों को सहेज के रखना अनमोल हैं।


Sunday, 18 September 2016

स्वपन...

एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं

अपनी स्वर्णमयी आभा से कल्पनाएँ साकार चाहता हैं,

उजाला ऐसा कि फिर अंधकार का स्थान न हो,

लक्ष्य की बाधाओं की चुनौती स्वीकार चाहता हैं,

संभावनाओं की सीमा लांघ असंभव को आत्मसात करना चाहता हैं,

एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।


ओझल न हो एक पल को भी,

 संशय का समाधान चाहता हैं,

आँखो में प्रतिपल प्रचंड अग्नि सा तेज चाहता हैं,

स्वप्न साकार हो ऐसा सिर्फ ऐसा विश्वास चाहता हैं,

एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।


Thursday, 18 August 2016

Expressive Eyes - Windows to the soul




After having taught body language for almost 8 years as a part of course curriculum now I just can't help myself noticing, analysing, interpreting, at times ignoring and above all concluding on my own the very perspective of the  people I meet in person or simply exchange glances. Well then as per my  perception  exchanging glances also count in meeting personally. Eyes have  always had their own tales to tell. Also eyes convey many emotions with a mere glance. The expression of eyes reveal lot many things.
Ah! Those ignoreing  glances!
Hmm!Appreciating glances!
Oh! jealous glances!
So! She is the one glances!
Why don't you take the initiative and come and talk to me? glances
 Didn't you noticed my 'solitaire'? glances
and the best of all warm, welcoming friendly glances which I love to reciprocate with.
Wohoo! How badly at times I wish not to notice but then can't really help myself 😊 But then on a positive note why not let the eyes tend to weave their magic and mesmerize.  Deep in my heart i actually wish to bask ourselves in the warmth of pure, springing relations and diminish all the amassed differences with the symphony of forgiveness


Dr Keerty Goyal

Wednesday, 17 August 2016

hindi in my roots

With a breeze of spring knocking and soothing rain in air these holidays gave me a wonderful time to spend luxuriously with my own self. Because of the time constraints knowingly or unknowingly I have developed a habit of storing clips from newspapers which obviously I intend to read but somehow could not most of the times. Shuffling through such clips, catching my eye in the very first glance was a quote- “I am happy England gave us a game of cricket which they can’t play really well and the English language which I can’t speak really well”. This very quote from Kapil Dev former Indian cricketer after receiving a ‘life time achievement award’ at the ‘House of Lords’ gave me heartfelt laugh on his very innocent honest confession. 
The language of the colonial masters who came to India as traders and then ruled us for almost two centuries wanted to create a local class of Indians who would have brown skin but English taste very soon became our own language-the official language, the link language, the library language, the language of trade and commerce, the language of science and technology including computer and the Internet, the language of essentiality if u want to excel in life. And trust me the parents working very hard on their kids and desperate to make them converse in the so called ‘elite language’. 
Although almost everyone would admit to the fact that English is going through a perilous phase with the current generation least bothered about writing even the simplest of things yet take pride in having a little knowledge of the language. Well then they are too busy to even write the words completely and further goggling for stuff like ‘write as i speak’ with this current fleeting generation. In a country of so many varied languages, English is the only linguistic commonality or we say that this language is increasingly becoming the de facto mother tongue in urban families. It’s a thing of dismay looking at the trend, contending that its rampant use will strip us off our sense of Indian-ness. “English is unifying us with the rest of the world but alienating us from our familial and cultural roots. Are we still under the slavery? Yes we are! It’s ironical when a writer and columnist like Chetan Bhagat says that hindi is a language of poor people, recently published in a leading national daily on editorial page.
‘Swear in English and people think you are cool, swear in hindi and people and people think you are uncouth’
Probably we have to make an astute move to reassure the usage of hindi language and the roots from where we hail. Or we will be sticking with the language bequeathed by India’s British rulers. “The world is moving on, and so are we but sure not at the cost of losing our own language. Let’s just use this language to simply nail it when it comes to making ‘them’ understand the way our former under-secretary general of the United Nations, distinguished writer and essayist and controversial Member of Parliament, Shashi Tharoor did recently....

real independence

कल हर भरतीय को देश प्रेम के रंग में रंगे देखा फिर कारण चाहे इंटरनेट पर वाल पेपर की सरल उपलब्धता हो या फिर टैकनौलिजी के प्रति प्रेम। इस भारतीयता की होड़, हर ख़ास आम के सिर चढ़ कर के बोली। एक चीज़ तो स्पष्ट थी कोई पीछे नहीं रहना चाहता था, बिना धर्म, जाति, समुदाय के भेदभाव के सभी भारतीयता के रंग में रंग गए फिर चाहे इसे एक दिन का आडंबर ही समझा जाए। जिस तरह पर्यावरण दिवस पर एक दिन पौधा लगाकर जीवन भर सींचते है प्राणवायु के लिए, जिस तरह दिवाली के एक दिन दिए जलाकर प्रतीकात्मक रूप से पूरे साल का जीवन का अँधियारा मिटाया जाता है, जिस तरह साल में एक बार क्रिसमस वाले दिन प्रभु यीशु के प्रेम संदेश को साल भर के लिए आत्मसात कर लिया जाता है, और ईद का चाँद हर किसी की आँखों का नूर बन इठलाता है तो क्यों नहीं स्वतंत्रता का जश्न हो, फिर चाहे एक दिन के लिए ही सही। सब कुछ सकारात्मक सोच पर ही तो निर्भर करता है। दैनिक भास्कर द्वारा आयोजित एक अनूठी पहल के अंतर्गत 'नो नैगिटिव लाइफ़ ' पर आयोजित व्याख्यान श्रंखला में पंडित विजय शंकर मेहता जी के साथ मंच संचालन का मौक़ा मिला। पंडित जी पिछले कई वर्षों से दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर 'जीने की राह' काॅलम लिखते है। इतनी सादगी के साथ बिना किसी कलिष्ठ भाषा ये समझा गए कि सरल होना वो भी मुस्कुराहट के साथ इतना भी मश्किल नहीं जितना प्रतीत होता है। अचानक से ही मन के कुछ उलझाव सुलझते नज़र आए। हमारा मन दस्तावेज़ और दर्पण दोनों है। क्यों नहीं इस स्वतंत्रता दिवस के दिन से अपने मन को सरल कर प्रेम, सदभावना जैसे शब्दों को अंतर्मन में उतारे तो निश्चित ही जीवन सरल सकारात्मक रूप से सच में स्वतंत्र हो जाएगा।

social media or human touch

Didi Ji kya aap face book par ho?" and without even waiting for the response, my helper at home continued in a tone of excitement 'ye to kamaal kee cheej hai didi, apne paros wali spana didi meri friend list mei hai aur kya mast photos dali hai unhone apne aur jiju ki'. Par kya tum padh leti ho? And to my astonishment she giggled 'no no didi! like karne mei angutha hee to dikhana hota hai. Meri beti ne mujhe samjha diya hai'. This need to connect, to share, to appreciate and be appreciated, to know, to be liked has always been a want of human nature since times immortal, though FB moulded the expression in an e-way and competition among cellular companies has made technology accessible to every individual. But even the times when technology was not so in-handy there were other things like real friends to play with, books to read, parents who were willing to listen with an open heart and plentiful of time. My childhood is filled with such nostalgic memories which even today brings a smile on my face. The best part being my Nanu who happen to inculcate the habit of writing letters within us when we just learned to write. And further there always use to be a new word which was a task for us to find its meaning and respond back with a new word. Almost every fortnight my younger sister and I desperately waited for our individual letters. Every shared emotion, appreciation, encouragement, guidance was silently received and responded back with equal buoyancy was something that made us write back to him. Years passed by but he never quit writing to us even from his deathbed. It's been 16 years since nanu left us but still I cherish and silently feel his soulful presence at every moment of my life. Some people wonder to the existence of paper and writing in this touch screen tap- tap era but then this metamorphosis is an essential need of times. Though this virtual presence, this texting style, smileys instead of written expression, these copy pasted googled emotions, this need to be connected 24/7 with the world without even realizing what's happening next room or next door and this self obsession is driving everybody crazy. But then it's high time now to realise the importance of equilibrium thereby not to let ourselves vault into an altogether e-world but focus on some very basic things like- to care, memories to cherish, to empathise, to respect, as nothing in the world can ever replace a warm handshake, a hug and a pleasant smile..

Karvachowth

सात्विकता, संयम, श्रद्धा, विश्वास और एक अलौकिक तेज किसी भी विवाहिता के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन चाॅद तक को हीनता का भाव महसूस करा देता है। लाल रंग एक अलग सुर्ख चादर ओढ़े, सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता, स्त्री को दिव्य रूप में परिवर्तित कर देता है। रंगो को अचानक से नई परिभाषा मिल जाती है, स्त्री सौंदर्य ऐसे सिर चढ़ कर बोलता है कि देखने वाला अपलक निहारता ही रह जाए, कुछ ऐसा जादुई प्रारूप है इस त्यौहार करवाचौथ का । अपने सौभाग्य की मंगल कामना और चिरआयु के लिए यह व्रत एक अखंड विश्वास है। विश्वास एक ऐसा जादूई शब्द है कि फिर सभी तथ्य इसके सामने बेमानी से लगते है। विश्वास था तो ब्रह्मांड खोजा गया, पृथ्वी की सूर्य के चारो ओर परिक्रमा करने के सच को उजागर किया गया फिर यह तो वह विश्वास है जिसने सावित्री को अखंड सौभाग्य का आशीष दे इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया। और यही खूबसूरती है भारतीयता की, भारतीय त्योहारो की । सम्पूर्ण विश्व में कही और यह आनंद कहां? इस सुखद अनुभूति को वही आत्मसात कर सकता हैं जो मन से भारतीय हो, आत्मा से रूढ़िवादी हो या यू कहें कि थोड़ा सा conservative हो। इस सात्विकता और विश्वास मे अपना अलग ही आनंद है।
लेकिन गहने, कपड़ों के बनावटी दिखावे, पार्टियो का माध्यम बन, शायद ये त्योहार अपना वास्तविक प्रारूप खोता जा रहा है। आत्म मंथन का समय है। मौन के साथ मंगलकामनाओ की स्तुति हो, विचारो की धरोहर इस टैक्नोलौजी के मायाजाल मे विलीन न हो जाए। स्त्री का अखंड सौभाग्य और विश्वास, परस्पर प्रेम, मंगलकामनाओ की आंतरिक शक्ति, खुशी बाह्य न हो कर रह जाए। काश टैक्नोलौजी अंतःमन की 'selfie' लेना इजाज़ कर पाए, काश ये 'smilies' download करते ही जिंदगी में download हो जाएँ, काश मन और विचारों की खूबसूरती बढ़ाते पार्लरो में हम जा पाए और ये बंधन सिर्फ प्रेम की अमूल्य कीमत का तोहफा बन जाएँ.......

बिटिया

अगर घर मे खिलखिलाहट है, अगर घर मे गुनगुनाने की मिठास है, अगर घर मे बोलने की चिड़िया सी चहचहाहट है तो समझ लीजिए घर में बिटिया हैं। घर के द्वार पर रंगों से सजी अल्पना, अंतर्मन को छूती और चेहरे के पृष्ठ पढ़ने की समझ एक बिटिया के अलावा कौन रख सकता हैं? जरा सी जिद कर, पल भर में सिर्फ बिटिया ही मान सकती हैं। शुभकामनाओ सी, एक दिव्य अनुभूति भला कहीं और कहां? गुस्से और परेशानी से भरे दिन की थकान मिटाती ऐसी ठंडक ढूंढने से भी नहीं मिलेगी। स्नेह की एक ऐसी अटूट डोर जो दिल के धड़कने का एहसास कराती है। एक अनुपम, सुखद एहसास जो घर को घर होने की परिभाषा देती हैं।
पर पता नहीं क्यों हाल के कुछ दिनों की घटनाओं से मन खिन्न सा हो बहुत बेचैन हैं। अजीब सी घबराहट के साथ एक गुस्सा हैं, न्याय पालिका के खिलाफ, कानून के प्रारूप के खिलाफ। सुबह का अखबार पूरे दिन का खाका तैयार करता हैं और उसी सोच के साथ उस दिन के काम अंजाम होते हैं। पर निर्भया जैसे जघंन्य कांड को अंजाम देने वाले मानसिक रोगियों के पक्ष में कोर्ट का फैसला पढ़ ऐसा लगा मानो पूरी मानवता पर अटट्हास हो रहा है।क्या गुज़रती होगी उस परिवार पर जिस घर की बेटी के साथ ऐसा घिनौने कृत्य को अंजाम दिया गया हो? वो बेटी जिसके हर सपने को उसके साथ उसके माँ और पापा ने भी जिया हो, जिसकी हर खिलखिलाहट के साथ माँ और पापा भी मुस्कुराएँ हो। चरित्र के साथ आत्मसम्मान का हरण कर विभत्स रूप में प्रताड़ित कर मौत के मुँह में पहुँचने वाले इन जघन्य अपराधियों को कानून कैसे बख्श सकता हैं? मन में चीत्कार और हाहाकार मचा हैं। न जाने कितनी युवतियाँ ऐसे दंश झेलती हैं जो ख़बरो का हिस्सा नहीं।
कोई भी आम आदमी कैसे इतना भद्दा खिलवाड़ कर सकता हैं? पर नहीं! कोई भी आम आदमी ऐसा विभत्स रूप नहीं दिखाएगा वो तो बस मूक दर्शक बन अखबार पढ़ेगा या फिर मोर्चा निकाल मोमबत्ती जलाएगा या फिर सोशल मीडिया पर खबर का लिंक शेयर करेगा या फिर मेरी तरह अपनी भड़ास लिख कर निकालेगा। पर क्या यह बहुत हैं? इस तरह के जघंन्य अपराध तो सिर्फ कुंठित मानसिकता का दानव ही अंजाम दे सकता हैं। अगर शरीर का कोई अंग गल कर सड़ांध देने लग जाएँ तो उसे काट कर फैक दिया जाता हैं। कौन है कानून बनाने वाले क्या वो हम में से एक नहीं, क्या कुछ संशोधन कर देना बहुत है, क्यों संवेदनहीन समाज के निर्माण में हम भी भागीदार बन मनुष्यता खो रहे हैं? क्यों टैक्नोलौजी का हमारे बच्चों का ज्ञान, कंप्यूटर में उनकी दक्षता, अंग्रेजी में उनका धारा प्रवाह बोलना हमारे लिए घमंड का विषय हैं? घर से ही एक बालक कई बातें प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूप से ग्रहण करता हैं। Ethics, moral education and respecting women कुछ ऐसी terms हैं जिनसे familiarise कराना एक माँ के रूप में हमारी नैतिक जिम्मेदारी हैं.....

खिड़कियाँ

अगर आपसे ये पूछा जाए कि घर मे खिड़की क्यों चाहिए तो लगभग सभी लोग कहेंगे-'अरे भई रौशनी, धूप और हवा के लिए'। पर अपने नए घर के प्रारूप पर विचार करते हुए एक नई ही बात सामने आई खिड़की के स्थान पर अब fixed transparent glass लगेगा जिससे बाहर का दिखेगा तो सब कुछ पर महसूस कुछ नहीं होगा।
खिड़कियाँ अब मंद हवा, सुनहरी गर्म धूप को महसूस कर खुलने वाली नहीं रही सिर्फ बाहर का नजारा देखने के लिए fixed glasses वाली हो गई हैं। हवा, फूलों की खुशबू, चिड़ियो का शोर, इन चीज़ों को महसूस करने की बातें अब पुरानी हो गई हैं
छोटे होते बाहर लौन में लगे रजनीगंधा के फूलों की खुशबू से कमरे के बाहर लगा कूलर पूरे घर को भर देता था। Botany के सारे chapters lawn और kitchen garden में बातो बातों में कब समझ आ जाते थे पता ही नही चलता था। flora, fauna की क्या मज़ाल कि दिमाग से निकल जाए। बे रोक टोक कहीं भी निकल जाते थे। उफ्फ ये खूबसूरत यादें!
पर आजकल स्कूलों में audio visual lab माध्यम रह गया हैं nature को समझने के लिए, घर में या तो बड़ो के लिए time नहीं है या वो साथ नहीं रह रहे है तो संस्कार wall paper पढ़ कर सीखें, soft skills की language lab रह गई हैं भाषा पर परिपक्वता के लिए और facebook दोस्तों के लिए।
आजकल दोस्त और रिश्ते बाहर से दिखने में साफ crystal clear पर बगैर हवा के से, तन्हा, घुटन से भरे हो गए हैं जो न तो दिल को छूते हैं, न महसूस होते हैं बस दिखते भर हैं। आइये इन बौने होते रिश्तों को प्यार की फुहार, अपनेपन और बड़प्पन की धूप, कुछ पुरानी बातें भूल वर्तमान में बाहे फैलाकर सिर्फ खूबसूरत यादों को समेटे एक नई शुरूआत करे, नहीं तो शायद वो दिन भी दूर नहीं जब रिश्तों की ही तरह खिड़कियो की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए भी virtual screens लगा दिए जाएंगे ...

गर्मियों की छुट्टियां

जैसे जैसे गर्मियों की छुट्टियां नजदीक आने को होती है बच्चों जितनी बेसब्री खुद में भी महसूस होने लगती हैं। पापा के हर फोन में पूछने पर कि 'बेटा जी कब आओगे? उत्सुकता अधीरता फिर से बच्चों की ही तरह बढ़ने लगती हैं। और उम्र के इस पड़ाव पर मन एक u-turn ले अपने खुद के बचपन में छलाँग लगा जाता हैं। ठीक ऐसी ही बेचैनी गर्मियो की छुट्टियों से पहले हमारे साथ साथ Mumma के चेहरे पर भी होती थी नानाजी के घर जाने की।
English literature मे Post graduate नानाजी का हर 15 दिनों मे हमारे लिए एक बहुत ही fine english मे letter आना और उसे समझ कर जवाब देना एक बहुत बड़ा challenge हुआ करता था। क्या कोई language lab ऐसी vocabulary बढ़ाएगी जो कई वर्षों तक लगातार मिलने वाले नीले रंग के Inland letters ने बढ़ाई। क्या कोई tourist resort वैसा आनंद दे पाएगा जो बहुत ही सीमित से संसाधनों में अंजाने मे ही हम लूट गए और क्या ये summar classes हमें जिंदगी की वो बारीकिया सिखा पाएंगी जो नानाजी बातो बातो में मन में पिरो गए और exchange program की तरह हम cousins आपस मे एक दूसरे के हुनर सीख गए। गहरे से वो रिश्ते, जहाँ ऊब शब्द ही नहीं होता था। था तो सिर्फ अनोखा सा बंधन, बेसब्री फिर से मिलने की और एक उत्साह दुगुनी शक्ति के साथ फिर खड़े होने का।
फिर अचानक से पापा का लेने आ जाना कि -'बाऊजी! बच्चों के बिना मन नहीं लगता' सारी मौसियो और मामा के बीच खिलखिलाहट का विषय सा बन जाता था। पोटली इतनी खूबसूरत यादों की कि बिखर जाएँ तो समेटना मुश्किल। इत्र की सुगंध सी मानो रोम रोम में बसी हो ये खूबसूरत यादें।आॅखे मूंदते ही सुनहरी यादों का shutter box सा खुल जाता है।
पर अब तो सब Skype पे रोज हीं मिल लेते हैं। बच्चे अपने माँ पिता को आने जाने की टिकट के साथ बुलाते हैं अपनी खुद की सुविधानुसार। ऐसा नहीं है कि प्यार नहीं है पर प्राथमिकताएँ बदल गई हैं। रिश्तों की वो गर्माहट कहीं खो सी गई हैं। सब कुछ होने के बाद भी और होने की होड़ और उससे भी ज्यादा दिखावे की होड़, ये खोखले से रिश्ते, ये फीकी सी हँसी, ये नकली से चेहरे, 'हम' को मिटा 'मै' को बार बार घिसती नीयते, ये बेमतलब की मसरूफियत।
तमाम जानकारी हाथों के महंगे मोबाइल में समेटे पर अपने ही माँ पिता के खाली दिलों से बेपरवाह। Tecnically wired but emotionally disconnected 😷
आंखों को मूंदते ही मुस्कुराहट बिखर जाए अब तो ऐसे app का इंतजार है, दिलों को wired रख पाए और अपनों को अपनों के पास सहेज पाए उस तकनीक की दरकार हैं। तो क्यों न इन छुट्टियों में अपने बच्चों को सपनों का वो आंगन दे, अपने बड़ों का वो सान्निध्य दे कि उस खुशबू से वो जिंदगी भर महकते रहें।