कल हर भरतीय को देश प्रेम के रंग में रंगे देखा फिर कारण चाहे इंटरनेट पर वाल पेपर की सरल उपलब्धता हो या फिर टैकनौलिजी के प्रति प्रेम। इस भारतीयता की होड़, हर ख़ास आम के सिर चढ़ कर के बोली। एक चीज़ तो स्पष्ट थी कोई पीछे नहीं रहना चाहता था, बिना धर्म, जाति, समुदाय के भेदभाव के सभी भारतीयता के रंग में रंग गए फिर चाहे इसे एक दिन का आडंबर ही समझा जाए। जिस तरह पर्यावरण दिवस पर एक दिन पौधा लगाकर जीवन भर सींचते है प्राणवायु के लिए, जिस तरह दिवाली के एक दिन दिए जलाकर प्रतीकात्मक रूप से पूरे साल का जीवन का अँधियारा मिटाया जाता है, जिस तरह साल में एक बार क्रिसमस वाले दिन प्रभु यीशु के प्रेम संदेश को साल भर के लिए आत्मसात कर लिया जाता है, और ईद का चाँद हर किसी की आँखों का नूर बन इठलाता है तो क्यों नहीं स्वतंत्रता का जश्न हो, फिर चाहे एक दिन के लिए ही सही। सब कुछ सकारात्मक सोच पर ही तो निर्भर करता है। दैनिक भास्कर द्वारा आयोजित एक अनूठी पहल के अंतर्गत 'नो नैगिटिव लाइफ़ ' पर आयोजित व्याख्यान श्रंखला में पंडित विजय शंकर मेहता जी के साथ मंच संचालन का मौक़ा मिला। पंडित जी पिछले कई वर्षों से दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर 'जीने की राह' काॅलम लिखते है। इतनी सादगी के साथ बिना किसी कलिष्ठ भाषा ये समझा गए कि सरल होना वो भी मुस्कुराहट के साथ इतना भी मश्किल नहीं जितना प्रतीत होता है। अचानक से ही मन के कुछ उलझाव सुलझते नज़र आए। हमारा मन दस्तावेज़ और दर्पण दोनों है। क्यों नहीं इस स्वतंत्रता दिवस के दिन से अपने मन को सरल कर प्रेम, सदभावना जैसे शब्दों को अंतर्मन में उतारे तो निश्चित ही जीवन सरल सकारात्मक रूप से सच में स्वतंत्र हो जाएगा।
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