Wednesday, 17 August 2016

गर्मियों की छुट्टियां

जैसे जैसे गर्मियों की छुट्टियां नजदीक आने को होती है बच्चों जितनी बेसब्री खुद में भी महसूस होने लगती हैं। पापा के हर फोन में पूछने पर कि 'बेटा जी कब आओगे? उत्सुकता अधीरता फिर से बच्चों की ही तरह बढ़ने लगती हैं। और उम्र के इस पड़ाव पर मन एक u-turn ले अपने खुद के बचपन में छलाँग लगा जाता हैं। ठीक ऐसी ही बेचैनी गर्मियो की छुट्टियों से पहले हमारे साथ साथ Mumma के चेहरे पर भी होती थी नानाजी के घर जाने की।
English literature मे Post graduate नानाजी का हर 15 दिनों मे हमारे लिए एक बहुत ही fine english मे letter आना और उसे समझ कर जवाब देना एक बहुत बड़ा challenge हुआ करता था। क्या कोई language lab ऐसी vocabulary बढ़ाएगी जो कई वर्षों तक लगातार मिलने वाले नीले रंग के Inland letters ने बढ़ाई। क्या कोई tourist resort वैसा आनंद दे पाएगा जो बहुत ही सीमित से संसाधनों में अंजाने मे ही हम लूट गए और क्या ये summar classes हमें जिंदगी की वो बारीकिया सिखा पाएंगी जो नानाजी बातो बातो में मन में पिरो गए और exchange program की तरह हम cousins आपस मे एक दूसरे के हुनर सीख गए। गहरे से वो रिश्ते, जहाँ ऊब शब्द ही नहीं होता था। था तो सिर्फ अनोखा सा बंधन, बेसब्री फिर से मिलने की और एक उत्साह दुगुनी शक्ति के साथ फिर खड़े होने का।
फिर अचानक से पापा का लेने आ जाना कि -'बाऊजी! बच्चों के बिना मन नहीं लगता' सारी मौसियो और मामा के बीच खिलखिलाहट का विषय सा बन जाता था। पोटली इतनी खूबसूरत यादों की कि बिखर जाएँ तो समेटना मुश्किल। इत्र की सुगंध सी मानो रोम रोम में बसी हो ये खूबसूरत यादें।आॅखे मूंदते ही सुनहरी यादों का shutter box सा खुल जाता है।
पर अब तो सब Skype पे रोज हीं मिल लेते हैं। बच्चे अपने माँ पिता को आने जाने की टिकट के साथ बुलाते हैं अपनी खुद की सुविधानुसार। ऐसा नहीं है कि प्यार नहीं है पर प्राथमिकताएँ बदल गई हैं। रिश्तों की वो गर्माहट कहीं खो सी गई हैं। सब कुछ होने के बाद भी और होने की होड़ और उससे भी ज्यादा दिखावे की होड़, ये खोखले से रिश्ते, ये फीकी सी हँसी, ये नकली से चेहरे, 'हम' को मिटा 'मै' को बार बार घिसती नीयते, ये बेमतलब की मसरूफियत।
तमाम जानकारी हाथों के महंगे मोबाइल में समेटे पर अपने ही माँ पिता के खाली दिलों से बेपरवाह। Tecnically wired but emotionally disconnected 😷
आंखों को मूंदते ही मुस्कुराहट बिखर जाए अब तो ऐसे app का इंतजार है, दिलों को wired रख पाए और अपनों को अपनों के पास सहेज पाए उस तकनीक की दरकार हैं। तो क्यों न इन छुट्टियों में अपने बच्चों को सपनों का वो आंगन दे, अपने बड़ों का वो सान्निध्य दे कि उस खुशबू से वो जिंदगी भर महकते रहें।

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