एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं
अपनी स्वर्णमयी आभा से कल्पनाएँ साकार चाहता हैं,
उजाला ऐसा कि फिर अंधकार का स्थान न हो,
लक्ष्य की बाधाओं की चुनौती स्वीकार चाहता हैं,
संभावनाओं की सीमा लांघ असंभव को आत्मसात करना चाहता हैं,
एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।
ओझल न हो एक पल को भी,
संशय का समाधान चाहता हैं,
आँखो में प्रतिपल प्रचंड अग्नि सा तेज चाहता हैं,
स्वप्न साकार हो ऐसा सिर्फ ऐसा विश्वास चाहता हैं,
एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।
अपनी स्वर्णमयी आभा से कल्पनाएँ साकार चाहता हैं,
उजाला ऐसा कि फिर अंधकार का स्थान न हो,
लक्ष्य की बाधाओं की चुनौती स्वीकार चाहता हैं,
संभावनाओं की सीमा लांघ असंभव को आत्मसात करना चाहता हैं,
एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।
ओझल न हो एक पल को भी,
संशय का समाधान चाहता हैं,
आँखो में प्रतिपल प्रचंड अग्नि सा तेज चाहता हैं,
स्वप्न साकार हो ऐसा सिर्फ ऐसा विश्वास चाहता हैं,
एक स्वपन है मेरे भीतर जो खिलकर सूर्य होना चाहता हैं ।

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